आज से 57 साल 8 महीने पहले 20 अक्टूबर 1962 के युद्ध में भारत की पराजय का अध्याय जुड़ गया था | हमारी शिक्षा व्यवस्था ने युवाओं को कभी ये नहीं बताय की पराजय क्यों हुई | तथ्यों को ध्यान से देखने पर पता लगता है कि ये सेना की हार नहीं अपितु योजनाबध राजनीतिक सरकार की जीत थी जिसके नारे टुकड़े टुकड़े गैंग लगाती है | हमारा उदेश्य सत्य को प्रकाशित करना है युवा अपनी बौद्धिकता का परिचय स्वयं दें |

युद्ध कभी भी अकारण नहीं होते 1962 में हुए युद्ध की नीव 6 अक्टूबर 1950 को पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना ने क़ामडो युद्ध (Battle of Chamdo) के पश्चात् रखी | भारत की सीमा में प्रवेश करने के लिए चीन ने तिब्बत का प्रयोग किया | 12 साल तक चीन तिब्बत के रास्ते भारत तक सड़कों का निर्माण कार्य तेजी से कर रहा था और भारत के अँगरेज़ प्रधानमंत्री का कहना था की हमे सेना को कोई ज़रुरत ही नहीं है | भारत का दुर्भाग्य था पहला प्रधानमंत्री और वेंगलिल कृष्णन कृष्णा मेनन जैसे रक्षा मंत्री | नेहरू कि गलतियों का खामियाज़ा भारत भुगत रहा है | प्रधानमंत्री बनने की साजिश का शुभारंभ 1938 में गांधी द्वारा कांग्रेस पार्टी की अध्यक्षीय दौड़ में सुभाष चंद्र बोस को दरकिनार करने की राजनीतिक पैंतरेबाजी ने नेहरू को स्वतंत्र भारत का प्रधानमंत्रित्व सौंप दिया। 1950 में बोस के बाहर निकलने और सरदार पटेल की मृत्यु के साथ, कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं था जो एक सेना के पुनर्निर्माण के लिए आवश्यक प्रेरणा प्रदान कर सकता था जो संभावित खतरों की पहचान सकता था |

चीन तिब्बत को अपना अभिनअंग घोषित कर चूका था और तिब्बत से होते हुए भारत तक हाईवे और सड़कें बना ली थी | जिसमें एक हाईवे अक्साई चीन तक बनाया गया जो भारत का हिस्सा था और जो पहले कभी भी विवाद का मुद्दा नहीं था | उस समय कि राजनीती कुछ ऐसी थी प्रधानमंत्री हिंदी-चीनी भाई भाई के नशे मैं चूर था और लोग हिंदी चीनी भाई भाई के नारे लगा रहे थे ये सारे टुकड़े टुकड़े गैंग के पूर्वज हैं | जिस समय प्रधानमंत्री राजनीती कि रोटियां सेकने में लगे थे उस समय भारतीय सेना चीन के बड़े खतरे को समझ चुकी थी लेकिन उस समय सेना मजबूर थी क्यूँकि तब सेना के पास न संसाधन थे न ही पर्याप्त बजट था | उस समय सेना का बजट ३०५ करोड़ रूपए था | 1959 तक चीन ने अक्साई चीन पर अपना कब्ज़ा मज़बूत कर लिया था | चीन ने मक्मोहन लाइन को मानाने से खोलेआम इंकार कर दिया था | मैकमोहन रेखा तिब्बत और भारत के उत्तर-पूर्व क्षेत्र के बीच सीमांकन रेखा है जो ब्रिटिश औपनिवेशिक प्रशासक सर हेनरी मैकमोहन द्वारा ब्रिटिश और तिब्बती प्रतिनिधियों के बीच 1914 शिमला सम्मेलन में प्रस्तावित है। यह चीन और भारत के बीच कानूनी सीमा है।

रक्षामंत्री एक घमंडी व्यक्ति था जिसने कभी न तो सेना को नहीं ही सैन्य अधिकारीयों को कोई महत्त्व दिया | वो सेना अधिकारीयों के सुझाव को महत्त्व नहीं देता था परिणाम स्वरुप सेना का मनोबल टूटता रहा | रक्षामंत्री अधिकारीयों को छोटे अफसरों के सामने बेइज़ात करता था और ये सब तब हो रहा था जब चीन भारत भूमि पर सड़कें बना रहा था और सेना एककत्रित कर रहा था | जब रक्षा मंत्री ने बात नहीं सुनी तो जनरल ने प्रधानमंत्री से मिलने का फैसला किया क्यूँकि वो जानते थे कि चीन कभी भी हमला (घुसपैठ) कर हमारी ज़मीन पर कब्ज़ा कर सकता है |

आज़ाद भारत की ENGLISH सरकार

इन मजबूरियों के बाबजूद थिमैय्या ने चीन के खतरे को समझा और सीमा पर दो युद्ध अभ्यास भी करवाए | परिणाम स्वरुप ये बात सामने आयी कि भारतीय सैनिकों कि संख्या और सैन्य उपकरण चीन से लड़ने के लिए पर्याप्त नहीं हैं | तत्पश्चात सेना कि ज़रूरतों के बारे में रक्षामंत्री मेनोन को एक सूचित किया गया क्यूँकि जनरल थिमैया कि जीवनी के अनुसार वो इस बात को समझते थे कि प्रधानमंत्री और रक्षामंत्री दोनों को कोई भी सैन्य अनुभव नहीं है और सैन्य मामलों कि जानकारी भी नहीं थी और ये सेना प्रमुख की ज़िम्मेदारी थी कि देश कि सुरक्षा और सेना कि ज़रूरतों के बारे में रक्षामंत्री को सूचित किया जाये लेकिन रक्षामंत्री ने सेना प्रमुख कि बातों और प्रस्तावों को ख़ारिज कर दिया |

जब जनरल प्रधानमंत्री से मिले तो उन्होंने सम्पूर्ण जानकारी दी और ये भी बताया कि कैसे रक्षामंत्री सेना प्रमुखों कि बात को ख़ारिज कर रहे हैं | जनरल ने सुझाव दिया कि रक्षा मंत्री को बुलाकर हालत कि गंभीरता समझाई जाये लेकिन दुर्भाग्य देखिये रक्षामंत्री किसी कि सुनता नहीं था और प्रधानमंत्री रक्षामंत्री कि बात काटता नहीं था | उस समय कि खटिया राजनीती अगर राष्ट्रहित में होती तो शायद चीन हम पर हमला करने की बात सोचता ही नहीं | प्रधानमंत्री ने जनरल से कहा कि वो रक्षामंत्री से बात करें और प्रोटोकॉल फॉलो करें | इस बात की सुचना जब रक्षामंत्री को मिली तो उसने जनरल को फटकार लगा दी | इसके बाद हताश हो कर जनरल थिमैया ने अपना इस्तीफा देने का फैसला किया | 31 अगस्त 1959 को जनरल थिमैया ने इस्तीफा दिया जिससे स्वीकार नहीं किया गया |

एक बार कल्पना करें उन राजनीतिक सत्ता धारियों के बारे में जो जानते थे कि सीमा पर देश के खिलाफ एक बड़ा संकट खड़ा है और उसी समय वो देश के सेना प्रमुख को कमज़ोर करने की साजिश कर रहे हों | बात इतनी बढ़ गयी की जनरल की अनदेखी करते हुए रक्षामंत्री ने प्रधानमंत्री के करीबी लूटिनेंट जनरल बी.एम. कौल (Brij Mohan Kaul) को सेना मुख्यालय ले कर आ गए और बिना सेना प्रमुख से चर्चा, 1962 में, लेफ्टिनेंट जनरल बी.एम. कौल को उत्तर पूर्व में जनरल ऑफिसर कमांडिंग (जीओसी) के रूप में नियुक्त कर दिया गया | परिणाम हम सब जानते हैं |

8 मई 1957 को जनरल कोदंडे सुबाया थिमय्या (Kodandera Subayya Thimayya) सेना प्रमुख बने | वे बहुत ही अनुभवी थे और उन्होंने ही 1948 में त्रास, कारगिल और लेह को पाकिस्तानी हमलावरों से मुक्त करवाया था | वह अपनी सेवानिवृत्ति तक सेना प्रमुख के रूप में बने रहे, उन्होंने प्रतिष्ठित सैन्य सेवा के 35 वर्ष पूरे किए | वे 7 मई 1961 को सेवानिवृत्त हुए और अगले 18 महीनों में हमने वह भारत भूमि दुश्मनों को दे दी, जिसके लिए हज़ारों भारतीयों ने अपने प्राण न्यौछावर किये थे | क्या यह एक संयोग था या योजनाबद्ध षड्यंत्र इसका उत्तर फैसला लेख के अंत में आप स्वयं कर सकेंगे |

युद्ध का परिणाम हम सब जानते हैं पर क्या हम ये जानते हैं की उस समय भी ज्योति बासु और हरकिशन सिंह सुरजीत लोग देश के अंदर चीन का समर्थन कर रहे थे | जब सेना को खून की ज़रुरत थी जगह जगह रक्तदान शिविर लगाए जा रहे थे ये उनका विरोध कर रहे थे | अत्यंत दुखद है कि ज्योति बासु जैसे राष्ट्रविरोधी को बंगाल ने २३ सालों तक लगातार मुख्यमंत्री चुना | CPI, CPM इसी विचारधारा के समर्थकों कि पार्टी है |

1962 के भारत-चीन संघर्ष के दौरान भारतीय सेना को अपनी सबसे खराब हार का सामना करना पड़ा। शिव कुणाल वर्मा की पूरी तरह से शोध की गई किताब से यह पता चलता है कि नेहरू और कृष्ण मेनन ने जनरल थिमय्या को कैसे बदनाम करने की साजिश रची, जो भारत के लिए योगदान देने वाली घटनाओं की एक श्रृंखला को हिमालय में स्थापित करता है।

है लिये हथियार दुश्मन ताक में बैठा उधर, और हम तैयार हैं सीना लिये अपना इधर।
खून से खेलेंगे होली गर वतन मुश्किल में है, सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है।

जयहिन्द!!


7 Comments

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