आज धर्मनिरपेक्षता की बात करने वालों को इतिहास नहीं भूलना चाहिए |आज से 492 वर्ष पूर्व जिहादी बाबर के सिपहसालार मीर बाक़ी ने 1528 में सांप्रदायिकता की सीमाओं को पार किया और मर्यादा परुषोतम श्रीराम जन्मभूमि पर मंदिर को तोड़ अपने जेहादी आका बाबर के नाम एक ढांचा बनाया जिसका उद्देश्य इस्लाम को सर्वोपरि बताना था |

भारत का गौरवशाली इतिहास गवाह है कि हम पराजित तभी हुए जब किले के दरवाज़े अंदर से खोल दिए गए अन्यथा ये असंभव था किन्तु हमने कभी भी समर्पण नहीं किया और श्रीराम मंदिर इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण बनेगा और वो हमारी आने वाली पीढ़ी के लिए एक प्रेरणास्रोत होगा |अयोध्या विवाद धर्म और अधर्म के बीच का एक संग्राम था। ये इस बात का प्रमाण है की असत्य कितना भी शक्तिशाली रहा हो लेकिन सत्य को हराया नहीं जा सकता |
सत्य की संग्राम यात्रा इस प्रकार है –

वर्ष 1528: मुग़लों द्वारा मंदिर को तोड़ दिया गया | वैसे भी जो पुस्तकालय जला सकते है उन बुद्धिहीन जाहिलों से मानवता की आशा करना मूर्खता है और इसके बाद धर्म के नाम पर कत्लेआम का एक दौर चला |

वर्ष 1853 (325 वर्षों बाद) : इस जगह के आसपास पहली बार दंगे हुए।

वर्ष 1857: एक साजिश कि शरुवात शहर कोतवाल घियासुद्दीन गाजी अपने परिवार के साथ रानी लक्ष्मी बाई के पहले स्वतंत्रता संग्राम और ब्रिटिश सैनिकों की भीड़ के डर से दिल्ली से भाग गया। उसे आगरा में ब्रिटिश सैनिकों द्वारा कथित तौर पर रोक दिया गया था क्योंकि उसने एक मुगल पोशाक पहनी थी । लेकिन झूठ बोलने में माहिर मुग़लों की औलाद उन्हें चकमा देने में कामयाब रहा और यह दावा किया कि वह एक कश्मीरी हिंदू है और उसका नाम पंडित गंगाधर नेहरू है। इन्हीं के वंशजों ने 1976 में भारतीयों को सेकुलरिज्म दिया जिसका मूल्य हम आज तक चूका रहे हैं |

वर्ष 1859 (331 वर्षों बाद ) : अंग्रेजी प्रशासन ने विवादित जगह के आसपास बाड़ लगा दी। मुसलमानों को ढांचे के अंदर और हिंदुओं को बाहर चबूतरे पर पूजा करने की इजाजत दी गई क्यूँकि 1857 के संग्राम के बाद अंग्रेज़ समझ गए थे कि यदि हिन्दुस्तान एक हो गया तो वो राज नहीं कर पाएंगे |

वर्ष 1949 (421 वर्षों बाद ) : स्वतंत्रभारत में असली विवाद शुरू हुआ 23 दिसंबर 1949 को, जब भगवान राम की मूर्तियां मस्जिद में पाई गईं। हिंदुओं का कहना था कि भगवान राम प्रकट हुए हैं, जबकि मुसलमानों ने आरोप लगाया कि किसी ने रात में चुपचाप मूर्तियां वहां रख दीं। यूपी सरकार ने मूर्तियां हटाने का आदेश दिया, लेकिन जिला मैजिस्ट्रेट के. के. नायर ने दंगों और हिंदुओं की भावनाओं के भड़कने के डर से इस आदेश को पूरा करने में असमर्थता जताई। सरकार ने इसे विवादित ढांचा मानकर ताला लगवा दिया।

वर्ष 1950 (422 वर्षों बाद ) : फैजाबाद सिविल कोर्ट में दो अर्जी दाखिल की गई। इसमें एक में राम लला की पूजा की इजाजत और दूसरे में विवादित ढांचे में भगवान राम की मूर्ति रखे रहने की इजाजत मांगी गई।

वर्ष 1959 (431 वर्ष बाद ): में निर्मोही अखाड़ा ने तीसरी अर्जी दाखिल की।

वर्ष 1961 (433 वर्षों बाद ): यूपी सुन्नी वक्फ बोर्ड ने अर्जी दाखिल कर विवादित जगह के पजेशन और मूर्तियां हटाने की मांग की।

वर्ष 1984 (456 वर्षों बाद ): विवादित ढांचे की जगह मंदिर बनाने के लिए 1984 में विश्व हिंदू परिषद ने एक कमिटी गठित की।

वर्ष 1986 (458 वर्षों बाद ): यू. सी. पांडे की याचिका पर फैजाबाद के जिला जज के. एम. पांडे ने 1 फरवरी 1986 को हिंदुओं को पूजा करने की इजाजत देते हुए ढांचे पर से ताला हटाने का आदेश दिया।

वर्ष 1992 (464 वर्षों बाद ): 6 दिसंबर 1992 राम भक्तों द्वारा विवादित ढांचे को गिरा दिया। देश भर में हिंदू-मुसलमानों के बीच दंगे भड़के गए, जिनमें हज़ारों लोग मारे गए।

वर्ष 2002 (474 वर्षों बाद ): संघ सेवकों को ले जा रही ट्रेन को गोधरा में आग लगा दी गई, जिसमें 58 लोगों की मौत हो गई। इसकी वजह से फिर दंगे हुए और हज़ारों लोग मारे गए।

वर्ष 2010 (482 वर्षों बाद ): इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपने फैसले में विवादित स्थल को सुन्नी वक्फ बोर्ड, रामलला विराजमान और निर्मोही अखाड़ा के बीच 3 बराबर-बराबर हिस्सों में बांटने का आदेश दिया।

वर्ष 2011 (483 वर्षों बाद ) : सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या विवाद पर इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले पर रोक लगाई।

वर्ष 2017 (489 वर्षों बाद ): सुप्रीम कोर्ट ने आउट ऑफ कोर्ट सेटलमेंट का आह्वान किया।

वर्ष 2019 (491 वर्षों बाद) :
8 मार्च : सुप्रीम कोर्ट ने मामले को मध्यस्थता के लिए भेजा। पैनल को 8 सप्ताह के अंदर कार्यवाही खत्म करने को कहा।
1 अगस्त : मध्यस्थता पैनल ने रिपोर्ट प्रस्तुत की।
2 अगस्त : सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मध्यस्थता पैनल मामले का समाधान निकालने में विफल रहा।
6 अगस्त : सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या मामले की रोजाना सुनवाई शुरू हुई।
16 अक्टूबर : अयोध्या मामले की सुनवाई पूरी। सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा और सत्य कि जीत हुई |लेकिन कहानी अभी ख़त्म नहीं हुई…

वर्ष 2020:
28 जुलाई : ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन (AIMIM) चीफ असदुद्दीन ओवैसी ने जो कहा उसको समझने की ज़रुरत है | ये एक नए युग और संग्राम का आगाज़ है…

आज धर्मनिरपेक्षता की वकालत करने वालों से एक सवाल ज़रूर पूछा जाना चाहिए कि अगर धर्मपरिवर्तन और मृत्यु के बीच चुनाव करना हो तो वो क्या चुनेंगे ?? आज ये सवाल निःसंदेह एक आवश्यता है अपने आप को पहचानने के लिए। कोई भी व्यक्ति अपने पूर्वजों के संस्कार और परम्परा को मृत्यु से भयभीत हो कर त्याग नहीं सकता क्यूँकि मृत्यु तो एक अटल सत्य है किन्तु दुर्भाग्यवश 1947 के बाद से एक ऐसे समाज को बनाया गया जो सत्य से दूर भागता है। धर्मनिरपेक्षता का अर्थ समर्पण नहीं अपितु हर मानवता कि रक्षा करना है। भारत को सेक्युलर कहने वालो को ये पता होना चाहिए की भारत सेक्युलर है क्यूँकि भारतीय धर्मनिरपेक्ष हैं अन्यथा वो देश जंहा 80% हिन्दू हों वह एक हिन्दूराष्ट्र है। भारतीय कभी किसी का अपमान नहीं करते लेकिन इसका अर्थ ये नहीं कि हम कमज़ोर हैं |

हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् ।
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः ॥
अर्थात
यदि तू मारा जाता है तो स्वर्ग को प्राप्त करेगा, यदि विजयी होता है तो पृथ्वी का भोग करेगा; इसलिए हे कुन्तीपुत्र अर्जुन ! युद्ध करने का निश्चय करके खड़ा हो ।

जयहिन्द!!


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